त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् का परिचय
त्रिशिखि ब्राह्मणोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदीय परम्परा से
सम्बद्ध है। उपनिषद् में ब्रह्मप्राप्ति के उपायभूत अष्टांगयोग का प्रमुखतया से
प्रतिपादन किया गया है। उपनिषद् क्या हैं, उपनिषदों का सम्पूर्ण परिचय एवं उपनिषदों की कुल संख्या साथ ही उपनिषदों में योग का स्वरुप क्या है इन विषयों पर हम पूर्व में ही चर्चा कर चुके हैं। त्रिशिखि ब्राह्मणोपनिषद् का शुभारम्भ त्रिशिखी ब्राह्मण
और भगवान् आदित्य के बीच आत्मा और ब्रह्म विषयक प्रश्नोत्तर से हुआ है इसलिए इस
उपनिषद् का नाम त्रिशिखि ब्राह्मणोपनिषद् पड़ा है।
उपनिषद् में त्रिशिखी ब्राह्मण और भगवान् आदित्य के बीच आत्मा और ब्रह्म विषयक प्रश्नोत्तर के उपरांत सर्वत्र शिवतत्त्व की विद्यमानता, ब्रह्म से अखिल जगत् की उत्पत्ति, एक ही पिण्ड का बहुधा विभाजन, आकाश आदि का अंश भेद, सूक्ष्मभूत मात्रा, आध्यात्मिक आदि विभाग, ब्रह्मा से लेकर पंचीकरण तक सृष्टि का विकास, जड़-चेतन विश्व की सृष्टि, चार अवस्थाएँ, दक्षिण और उत्तरायण गति, सद्यः मुक्ति प्रदायक ज्ञान, ज्ञानप्राप्ति के उपायभूत योग, कर्मयोग - ज्ञानयोग आदि की चर्चा हुई है।
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तदुपरान्त उपनिषद् में निर्विशेष ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के उपायभूत अष्टांगयोग, दस प्रकार के यम, नियम, हठयोग के आसन, नाड़ीशोधन तथा प्राणायाम की विविध विधियाँ, अग्नि मंडल का स्वरूप, नाड़ीचक्र में जीव का भ्रमण आदि का वर्णन प्राप्त होता है।
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