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योग का अर्थ | योग क्या है | Yog Ka Arth | Yog Kya Hai | योग का अर्थ एवं परिभाषा

योग का अर्थ

योग का अर्थ है जुड़ना योग तत्वतः बहुत सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित एक आध्यात्मिक विषय है जो मन एवं शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर ध्यान देता है। यह स्वस्थ जीवन-यापन की कला एवं विज्ञान है। योग से जुड़े ग्रंथों के अनुसार योग करने से व्यक्ति की चेतना ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है जो मन एवं शरीरमानव एवं प्रकृति के बीच परिपूर्ण सामंजस्य का द्योतक है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड की हर चीज उसी परिमाण नभ की अभिव्यक्ति मात्र है। जो भी अस्तित्व की इस एकता को महसूस कर लेता है उसे योग में स्थित कहा जाता है और उसे योगी के रूप में पुकारा जाता है जिसने मुक्त अवस्था प्राप्त कर ली है जिसे मोक्ष, निर्वाण या मुक्ति कहा जाता है।

इस प्रकार योग का लक्ष्य आत्म-अनुभूतिसभी प्रकार के कष्टों से निजात पाना है जिससे मोक्ष की अवस्था या कैवल्य की अवस्था प्राप्त होती है। जीवन के हर क्षेत्र में आजादी के साथ जीवन-यापन करनास्वास्थ्य एवं सामंजस्य योग करने के प्रमुख उद्देश्य होंगे। योग का अभिप्राय एक आंतरिक विज्ञान से भी है जिसमें कई तरह की विधियां शामिल होती हैं जिनके माध्यम से मानव इस एकता को साकार कर सकता है और अपनी नियति को अपने वश में कर सकता है।

Yog Ka Arth By Yoga And Ayurveda Science

योग के आधारभूत तत्व की वीडियोस देखें

चूंकि योग को बड़े पैमाने पर सिंधु-सरस्वती घाटी सभ्यता, (जिसका इतिहास 2700 ईसा पूर्व से है) के अमर सांस्कृतिक परिणाम के रूप में बड़े पैमाने पर माना जाता हैइसलिए इसने साबित किया है कि यह मानवता के भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों तरह के उत्थान को संभव बनाता है। बुनियादी मानवीय मूल्य योग साधना की पहचान हैं। योग का अर्थ है- जोड़ना। किससेसत्य से! सत्य से जुड़ना आसान नहींक्योंकि वह अत्यंत सूक्ष्म है और दिव्य भी।

ऋषियों ने कहा है कि जिसे प्राप्त करना चाहते होउस सरीखा अपना स्वभाव बनाओ। स्पष्ट संकेत हैसत्य कि अनुभूति करना चाहते होतो सत्य का आचरण करो। सत्य का आचरण करने का अर्थ है अपनी आदतों से टकराओ। उसके लिए मनोबल चाहिए। मन का संबंध शरीर से है इस प्रकार अपनी आदतों से संघर्ष रूपी तप के लिए जरूरी है तन - मन अर्थात् दोनों का बलवान होना। बाह्य साधनाओं को आवश्यकीय मानने का आधार यही तथ्य है। ऋषियों ने साधना की शूरूआत सामान्य बातों से की। वे जानते थेकि छोटी-छोटी कही जाने वाली बातों का महत्व। वे जानते थे छोटा-छोटा ही निर्माण करता है बड़े का बूंद-बूंद से बनता है महासागर-जो अनंतशक्ति संपन्न होता हैजिसकी गहराई को नाप पाना असंभव हो जाता है।

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योग का शाब्दिक अर्थ आत्मा का परमात्मा के मिलन से है। योग क्या हैइस प्रसंग के सामंजस्य के लिए हमें योग को दो भागों में विभाजित करके विचार करना पड़ेगा 

1. योग साधना

2. योग दर्शन

जीवन जीने की साधना की दृष्टि में योग एक ऐसी जीवनी कला हैजिसके द्वारा साधक इस लोक में एहिक विषयों का सेवन करते हुये भी ‘जले कमलवत’ निर्लिप्त रह सकता है। आसक्ति को छोड़कर नियत कर्म करना ही योग हैऔर इसी का नाम कर्मयोग भी है। योग के उपर्युक्त दोनों पक्षों अर्थात् योग साधना एवं योग दर्शन का महर्षि पतंजलि ने अपने योगग्रन्थ पातंजल योगसूत्र में बड़ा ही हृदग्राही समन्वय किया हैइसलिए यह ग्रन्थ योग साधकोंयोग दार्शनिकों के लिए सर्वाधिक प्रिय है।

योग की अन्य परिभाषा

योग शब्द ‘युज’ धातु से उत्पन्न हुआ हैधातु पाठ में योग शब्द के लिए दो धातु प्राप्त होती है-

1. युजिर योगे

2. युज समाधो

युजिर योगे धातु से निष्पन्न योग शब्द सामान्य सम्बन्ध का वाचक है। इस शब्द की योग साधना के क्षेत्र में कोई उपयोगिता नहीं है। युज समाधो धातु से निष्पन्न योग शब्द का अर्थ- समाधि से है, "व्यास भास्य" में "योगः समाधि" कहकर योग का समाधि से प्रायः स्विकार किया है। पाणिनि जी ने योग शब्द की व्युत्पत्ति युजिर योगेयुज समाधो इन दो धातुओं से की है। प्रथम उत्पत्ति के अनुसार योग शब्द का अनेक अर्थों में प्रयोग किया जाता है। जैसे- जोड़ना, मिलना, मेल इत्यादि। इसी आधार पर जिवात्मा और परमात्मा का मिलन योग कहलाता है। इसी संयोग कि अवस्था को समाधि की संज्ञा दी गई हैजो कि जिवात्मा परमात्मा की समता अवस्था जनित होती है।

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