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वैकल्पिक चिकित्सा का महत्व | Importance of Alternative Therapy

वैकल्पिक चिकित्सा का महत्व

पाश्चात्य, ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति का उद्देश्य रोगों का उपचार तथा स्वस्थ करना है। जबकि पारम्परिक चिकित्सा पद्धति का उद्देश्य रोग को रोकना है। एक पारम्परिक चिकित्सक पहले एक दार्शनिक है तत्पश्चात् एक चिकित्सक। उसका प्राथमिक प्रशिक्षण आदर्श रूप में जीवन के आध्यात्मिक तत्वों पर आधारित होता है। तत्पश्चात् उसकी विधिवत् शिक्षा का अधिकांश भाग जीवन के एकीकृत, शुद्ध विचारधारा तथा स्वास्थ्य एवं उपचार में एवं इसके उपयोग में संलग्न रहता है।

यदि स्वास्थ्य लाभ के कुछ निश्चित नियमों का पालन न किया जाये तो कोई भी चिकित्सा तकनीक सही मायने में सफल सिद्ध नहीं होगी। सर्वप्रथम स्वस्थ होने के लिये स्वस्थ होने की इच्छा शक्ति आवश्यक है। अपने भीतर के उन आत्मकृत दुरूपयोगों का निराकरण करना चाहिए, जो हमें अस्वस्थ बनाती हैं एवं पीड़ा पहुँचाती हैं। हमारे प्रयासों में कर्मठता होनी चाहिए तथा उपचार प्रक्रिया के दौरान हतोत्साहित नहीं होना चाहिए।

वैकल्पिक-चिकित्सा-का-महत्व

एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से होने वाले दुष्प्रभावों के कारण लोगों में चिंता बढ़ रही है तथा वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के क्षेत्र में होने वाले नित नये अनुसंधानों ने इसमें लोगों का विश्वास बढ़ा है। सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं, बल्कि विकसित देशों में भी इसके प्रति रूझान बढ़ा है।

भारतवर्ष में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के प्रति बढ़ते झुकाव का कारण उन एलोपैथिक औषधियों की बिक्री भी है, जिन पर विकसित देशों में खतरनाक मानकर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। ऐसी जानकारियाँ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक व चिंतित वर्ग के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण ऐसी जीवन पद्धति एवं चिकित्सा पद्धति को अपनाना चाहता है जो उपचार की तुलना में विकार नियंत्रण में ज्यादा कारगर हो।

आधुनिक युग में सुविधाएँ अपरिमित परिमाण में बढ़ी हैं। जैसे-जैसे विज्ञान के नये अविष्कार हाथ आते गए, व्यक्ति उतना ही श्रम की दृष्टि से विलासी बनता चला गया है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि जब भी व्यक्ति एकाकी प्रगति करता है उसे कहीं न कहीं तो घाटा उठाना ही पड़ता है। इस घाटे को हम आधुनिक सभ्यता का अभिशाप भी कह सकते हैं। आज दृश्यमान अस्वस्थ मानव समुदाय इसकी जीती जागती तस्वीर है। शरीर एवं मन दोनों की दृष्टि से रूग्ण, दुर्बल व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग तक नहीं कर पा रहा है।

आज के चिकित्सक को यह भली-भाँति समझ में आ गया है कि आधुनिक युग में उपलब्ध औषधियों से समग्र चिकित्सा सम्भव नहीं है। बड़ी ही जल्दी शरीर उन औषधियों के प्रति इम्युनिटी विकसित कर लेता है जिससे वे लगभग प्रभावहीन ही सिद्ध होती है। बैक्टीरीया बायोलॉजी एवं क्लीनिकल इकॉलाजी जैसे विषयों पर शोध का क्षेत्र बढ़ता चला जा रहा है जितनी व्याधियाँ हो रही हैं। उसमें प्रधान कारण वातावरण का ख़राब होना है।

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के नामों पर जब भी विचार होता है तो एक सीमित दायरे में घूमकर रह जाता है। एलोपैथी की सबसे बड़ी देन यह है कि उसने रोगों के कारणों के बारे में आधुनिक ढंग से चिन्तन करना सिखाया। चिकित्सा पद्धति कितनी निरापद है, इस विवाद में पड़े बिना यह चर्चा करना अभीष्ट होगा कि वर्तमान परिस्थितियों में एक विशाल समुदाय में उपचार का मंत्र किस तरह फूंका जाये।

डॉ. इरासम्स डार्विन ने लिखा है- मेरा विश्वास है कि निकट भविष्य में चिकित्सा एक क्रान्ति होने वाली है। चिकित्सक अगले दिनों दवाओं का उपयोग अनिवार्य स्थिति में ही करेंगे। उनका मुख्य कार्य रोगी की उन भूलों का पता लगाना होगा जिनके कारण उसे बीमार पड़ना पड़ा। चिकित्सक भूलों को सुधारने भर का परामर्श दिया करेंगे और वह बताया करेंगे कि प्रकृति के अनुरूप चलने के अतिरिक्त स्वास्थ्य संकट से निवारण का और कोई उपाय नहीं है।

प्रो. एच. जी. बॉक्स ने लिखा है- बीमारों की बुद्धिमानी इस बात में है कि वे कम से कम औषधियों का सेवन करें।

सन् 1974 में एक सर्वेक्षण के दौरान यू.एस. शिनल इन्सटीट्यूट आफ हैल्थ ने 9 हजार रोगियों का अध्ययन किया। इनमें से 70 रोगी ऐसे थे जिनकी रोग निरोधक क्षमता बिल्कुल जरा-जीर्ण अवस्था में पाई गई। पूछने से ज्ञात हुआ कि ये सभी मरीज ऐसी रासायनिक दवाओं का प्रयोग करते थे जो दमनकारी थी। बाद में यही लोग कैंसर ग्रस्त पाये गये।

इन तथ्यों को ध्यान मे रखते हुए आधुनिक चिकित्सक अब वैकल्पिक उपचार पद्धति पर जोर दे रहे हैं और अपनी चिकिसा प्रणाली में इनका समुचित समावेश भी कर रहे हैं। जब से व्याधियों के मूल में मन की अहम भूमिका की वैज्ञानिक पुष्टि हुई है तब से मनोनियमन और सन्तुलन पर विशेष बल दिया जा रहा है एवं मानसिक अस्तव्यस्तता मिटाने तथा बिखरी शक्ति जुटाने के लिए ध्यान, धारणा एवं शारीरिक रोगों से बचने के लिए आसन प्राणायाम की डॉक्टरी सलाह दी जाती है।

वैकल्पिक-चिकित्सा

एलोपैथिक दवाओं की प्राणहारी प्रतिक्रियाओं को देखते हुए यह उपचार पद्धति सही भी है और निरापद भीक्योंकि आज की रासायनिक दवाएँ इस बात की कोई गारण्टी नहीं देती कि रोग को जड़-मूल से वे नष्ट कर ही देंगी। साथ ही इस बात का भी भय बना रहता है कि प्रतिक्रिया स्वरूप कहीं कोई दूसरा रोग न विकसित हो जाये।

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इस स्थिति में एक ऐसी पद्धति की तलाश थी जो प्रस्तुत स्वास्थ्य संकट के अनुकूल सिद्ध हो सके और वर्तमान आधि - व्याधियों का सही उपचार सुझा सके।

उपसंहार

देव दुर्लभ मानव शरीर को स्वस्थ रखे बिना प्राणी अपने लक्ष्य तक पहुँच नहीं पाता। कर्म, ज्ञान, भक्ति, उपासना और चतुर्विध पुरूषार्थ के समुचित साधन स्वस्थ जीवन में ही सम्भव हो सकते हैं।

आजकल शारीरिक तथा मानसिक भोग-विलास के प्रसाधनों की इतनी विपुलता हो गयी है कि सामान्य मानव मानसिक शान्ति और शारीरिक स्वास्थ्य से दिनों दिन विमुख एवं वंचित होता जा रहा है। जीवन की अतिव्यस्तता, विलासिता या इन्द्रिय लोलुपता के कारण मानसिक तनाव तथा शारीरिक कष्ट बढ़ता जा रहा है। मानव के सहज स्वाभाविक गुण प्रेम, सहानुभूति, सेवा तथा सद्व्यवहार आदि तीव्र गति से समाप्त होते जा रहे हैं। इन परिस्थितियों में पाचनतंत्र के रोगो की उत्पत्ति होती हैं जो सब प्रकार के रोगों के कारण हैं। गम्भीरता से विचार करने पर यह ज्ञात होगा कि अंतर्मन में व्याप्त भय, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, राग-द्वेष के साथ ही समस्त रोगों का बीज या अंकुर विद्यमान है।

आज कल लोग स्वस्थ तो रहना चाहते हैं पर इसके लिए डाक्टरी दवाओं को प्रयोग अधिक करने के परिणाम स्वरूप उपस्थित रोग के दब जाने पर भी अन्य कई रोगों के बीज का सूत्रपात शरीर में हो जाने से निरन्तर कष्ट में पड़े रहते है। सामान्यतः व्यक्ति छोटी-मोटी बीमारियों से परेशान रहते हैं और उनके लिये उन्हें बार-बार चिकित्सकों की शरण लेनी पड़ती है।

वास्तव में खान-पान, आहार-विहार एवं रहन-सहन की अनयिमितता तथा असंयम के कारण ही रोग और व्याधियों का प्रादुर्भाव होता है। संयमित और नियमित जीवन से प्राणी रोगमुक्त हो जाता है। प्रकृति के कुछ सरल और स्वाभाविक नियम हैं, जिनके अनुपालन का ध्यान रखने पर व्यक्ति प्रायः अस्वस्थ नहीं होते। यदि किसी कारणवश कोई बीमारी हो जाती है तो बिना औषधि सेवन किये वे प्राकृतिक नियमों के पालन से स्वस्थ हो सकते हैं ऐसी ही प्रकृति द्वारा प्रदान प्रणालियाँ जिन्हें हम "वैकल्पिक चिकित्सा'' के नाम से जानते हैं।

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