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आस्तिक और नास्तिक दर्शन | Astik and Nastik Darshan | आस्तिक और नास्तिक

भारतीय दर्शन का वर्गीकरण

भारतीय दर्शनों का वर्गीकरण अर्थात् आस्तिक और नास्तिक दर्शनों के बारे में जानने से पूर्व हमें भारतीय दर्शन के बारे में जान लेना अत्यंत आवश्यक है। दर्शन के बारे जाने बिना व दर्शन शब्द का तात्पर्य समझे बिना हम आस्तिक और नास्तिक दर्शन के बारे में पूर्णतः जान अथवा समझ नहीं सकते। दर्शन शब्द का अर्थ तथा भारतीय दर्शन की विशेषताएं इस विषय में हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं। व्यवहार में हम दर्शन का तात्पर्य देखने से लेते हैं जबकि दर्शनशास्त्र के अनुसार दर्शन शब्द का तात्पर्य किसी भी घटना के पीछे छुपे हुए सत्य को जानना है।

भारतीय दर्शन रूपी वृक्ष में अनेकानेक शाखाएँ प्राचीन काल से ही रही हैं। भारतीय संस्कृति की एक बड़ी विशेषता है कि यहाँ हर एक ने अपने विरोधी के विचारों को सुना है अर्थात् उसकी आलोचना की है तो उसका सम्मान भी किया है। यही कारण है कि हमारे देश में एक ही समय में परस्पर विरोधी विचारधारा वाले दर्शन भी समानान्तर रूप से फले-फूले हैं। भारत-भूमि में पनपे इन अनेकानेक दर्शनों को सामान्यतया आस्तिक और नास्तिक इन दो वर्गों में बाँटा जाता है, किन्तु इस विभाजन में अनेक असंगति है, इसीलिए कुछ विद्वानों ने इन्हें वैदिक और अवैदिक इन दो वर्गों में बाँटा है। अब आगे हम आस्तिक और नास्तिक दर्शन के विषय में जान लेते हैं-

Astik-and-Nastik-Darshan

आस्तिक और नास्तिक दर्शन की सम्पूर्ण व्याख्या विडियो देखें

आस्तिक और नास्तिक दर्शन

सामान्यतया भारतीय दर्शन को आस्तिक और नास्तिक इन दो वर्गों में बाँटा जाता है। षड्दर्शन, जिसमें सांख्य दर्शन, योग दर्शन, न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, वेदान्त दर्शन और मीमांसा दर्शन आते हैं, ये सब दर्शन आस्तिक दर्शन की श्रेणी में आते हैं तथा जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन और चार्वाक दर्शन ये नास्तिक दर्शन की श्रेणी में रखे जाते हैं।

आस्तिक और नास्तिक का अर्थ

सामान्यतया आस्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास रखने वाले तथा नास्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास न रखने वाले से लिया जाता है किन्तु भारतीय दर्शन के सभी आस्तिक दर्शन ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हों और नास्तिक अस्वीकार करते हों, ऐसी बात नहीं है। बल्कि यहाँ आस्तिक और नास्तिक का अर्थ दूसरा ही है। यहाँ मनु की परिभाषा नास्तिको वेद निन्दक: के आधार पर की जाती है। अर्थात् नास्तिक उसे कहा गया जो वेद निन्दक है अथवा जो वेद की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करता। इसके विपरीत आस्तिक वह है जो वेदों का मानता है और इस तरह वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करता है।

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इस प्रकार भारतीय दर्शन में वेद विरोधी दर्शन नास्तिक दर्शन तथा वेद समर्थक दर्शन आस्तिक दर्शन कहलाये। यहाँ उल्लेखनीय है कि सांख्य दर्शन और मीमांसा दर्शन ईश्वर को नहीं मानने के बाद भी आस्तिक वर्ग में रखे जाते हैं क्योंकि वे वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं।

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