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कौषीतकि ब्राह्मणोपनिनिषद् का परिचय | Kaushitaki Upanishad | कौषीतकि उपनिषद

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिनिषद् का परिचय

यह कौषीतकिब्राह्मणोपनिनिषद् ऋग्वेद के कौषीतकि ब्राह्मण का एक अंश है। उपनिषद् क्या हैं एवं उपनिषदों की कुल संख्या कितनी है साथ ही उपनिषदों में योग का स्वरुप क्या है इन विषयों पर हम पूर्व में ही चर्चा कर चुके हैं। इस उपनिषद् में कुल चार अध्याय हैं। जिनमें जीवात्मा और ब्रह्मलोक, प्राणोपासना, अग्निहोत्र, विविध उपासनाएं, प्राणतत्व की महिमा तथा सूर्य आदि में विद्यमान चैतन्य तत्व की उपासना पर प्रकाश डाला गया है। अन्त में 'आत्मतत्त्व' के स्वरूप और उसकी उपासना से प्राप्त फल पर विचार किया गया है।

प्रथम अध्याय में गौतम (उद्दालक) एवं चित्र (गर्ग के प्रपौत्र) के संवाद द्वारा अग्निहोत्र एवं उसकी फलश्रुति पर प्रकाश डालते हुए अग्निहोत्री के मरणोपरान्त उसकी जीवात्मा किन - किन लोकों में होती हुई ब्रह्मलोक पहुँचती है, जहाँ अप्सराएँ उसका स्वागत सत्कार करती हैं, वहाँ एक विचित्र पर्यंक (पलंग) पर ब्रह्माजी विराजमान होते हैं, जिनसे अग्निहोत्र साधक की वार्ता होती है, अन्त में वह साधक ब्रह्माजी की विशेष विभूति से युक्त होकर उन्हीं के सदृश हो जाता है, इत्यादि का वर्णन है इसी को पर्यंक विद्या भी कहा जाता है।

Kaushitaki Brahmana Upanishad

द्वितीय अध्याय में प्राणोपासना, आध्यात्मिक-अग्निहोत्र, विविध उपासनाएँ, दैवपरिमर में प्राणोपासना, मोक्ष हेतु सर्वश्रेष्ठ प्राणोपासना तथा प्राणोपासक का सम्प्रदान कर्म वर्णित है। तृतीय अध्याय में इन्द्र-प्रतर्दन संवाद के माध्यम से प्रज्ञा स्वरूप प्राण की महिमा का वर्णन है।

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चतुर्थ अध्याय में अजातशत्रु और गार्ग्य संवाद द्वारा सर्वप्रथम सूर्य, चन्द्र, विद्युत्, मेघ, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्पण, प्रतिध्वनि इत्यादि में विद्यमान चैतन्य तत्व की उपासना की बात कही गई है और अन्त में 'आत्मतत्त्व' के स्वरूप और उसकी उपासना की फलश्रुति का प्रतिपादन किया गया है। कौषीतकि ब्राह्मणोपनिनिषद् का परिचय इस प्रकार से प्राप्त होता है

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